Saturday, December 3, 2022
HomeBollywoodवो मिलिटरी कमांडर जिसने देश के सरेंडर करने के 29 साल बाद...

वो मिलिटरी कमांडर जिसने देश के सरेंडर करने के 29 साल बाद तक जंग जारी रखी, उसे पता नहीं था कि जंग बंद हो चुकी है!— News Online (www.googlecrack.com)

अंग्रेजी की एक कहावत है- Struggle and Shine… मुश्किल वक्त में जो लोग साहस का परिचय देते हैं वही इतिहास रचते हैं. जंग के मैदान में टिके रहने के लिए सिपाही की ताकत हथियार और रणनीति तो होती ही है लेकिन जंग जीतने का रास्ता साहस से ही तय होता है. हम आज एक ऐसे मिलिटरी ऑफिसर की कहानी आपको सुनाने जा रहे हैं जो जंग खत्म होने के बाद भी 29 साल तक मोर्चे पर डटा रहा और दुश्मन को नुकसान पहुंचाता रहा, जो अपने साहस की बदौलत जीते जी किवदंती बन गया. हम कहानी सुनाने जा रहे हैं हीरू ओनीडा की जिनकी कहानी दुनिया की सबसे अनोखी वॉर स्टोरी है.

…साल 1944 का था, दूसरा विश्वयुद्ध अपने परिणाम की ओर बढ़ रहा था. पर्ल हार्बर अटैक के बाद अमेरिका जापान को सबक सिखाने की तैयारी में था. 26 दिसंबर 1944 को जापानी इम्पीरियल आर्मी के सेकेंड लेफ्टिनेंट हीरू ओनीडा को फिलीपींस में लुबांग के छोटे से द्वीप पर भेजा गया. उसे आदेश दिया गया था कि जितना भी संभव हो सके अमेरिकी सेना के मूवमेंट को रोके. उसे हर कीमत पर अपनी जंग जारी रखनी थी और कभी सरेंडर नहीं करना था. इसी आदेश के साथ एक आत्मघाती मिशन पर हीरू ओनीडा अपनी टीम के साथ निकले. अमेरिकी सेना ने पूरी ताकत से हमला किया और फरवरी 1945 में लुबांग द्वीप पर कब्जा कर लिया. बहुत से जापानी सैनिक या तो मारे गए या उन्हें सरेंडर करना पड़ा.

लेकिन सेकेंड लेफ्टिनेंट हीरू ओनीडा और उनके तीन साथी किसी तरह जंगल में छिपे रह गए. उन्होंने वहीं से अमेरिकी फौज और उनका साथ दे रहे स्थानीय सैनिक और लोगों के खिलाफ गुरिल्ला जंग छेड़ दी. वे उनकी सप्लाई लाइन पर हमला करते, भटके सैनिकों और सैन्य टुकड़ियों पर हमला करते, और जिस तरीके से भी बन पड़ता अमेरिकी सेना के मूवमेंट को बाधित करते. उसी साल अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया और भारी तबाही के बाद जापान को सरेंडर करना पड़ा. दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति का ऐलान हो गया.

हालांकि, अभी भी हजारों जापानी सैनिक प्रशांत महासागर के द्वीपों में बिखरे पड़े थे और ज्यादात्तर हीरू ओनीडा की तरह जंगलों में छिपे थे. उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि युद्ध समाप्त हो चुका है. उस समय संचार के ऐसे साधन भी नहीं थे कि सभी सैनिकों को सूचना मिल पाती. ये छिपे हुए सिपाही पहले की तरह ही हमला और लूटपाट करते रहे. इन हमलों को रोकने के लिए अमेरिका की फौज ने सरेंडर कर चुके जापानी फौज और सरकार के साथ मिलकर फिलीपींस के जंगलों में हजारों पर्चियां गिराईं, जिसमें ऐलान किया गया था कि युद्ध खत्म हो चुका है और अब हरेक सैनिक को अपने घर वापस लौटना चाहिए.

 

दूसरे लोगों की तरह, हीरू ओनीडा और उनके आदमियों ने भी इन पर्चियों को पढ़ा लेकिन तय किया कि ये पर्चियां झूठी हैं और गुरिल्ला लड़ाकों को जंगल से बाहर निकालने की अमेरिकी फौज की चाल है इसलिए इस पर भरोसा नहीं करना चाहिए. हीरू ओनीडा ने वे पर्चियां जला दीं और छिप कर हमला जारी रखा.

पांच साल बीत गए, पर्चियां बंटनी बंद हो गईं और ज्यादातर अमेरिकी फौज अपने देश वापस लौट गईं. लुबांग की स्थानीय जनता भी अपने काम, खेती और मछली पालन में लग गई लेकिन हीरू ओनीडा की टीम जंग के मोड में बनी रही और जो मिलता उसपर हमले करते रही. परेशान होकर फिलीपींस की सरकार ने नई पर्चियां छपवाकर उन्हें जंगल में गिरवाया. जिसमें लिखी थीं- ‘बाहर आ जाओ, युद्ध खत्म हो गया है, तुम लोग हार गए हो’. हीरू ओनीडा और उनके लोगों ने इन पर्चियों पर भी भरोसा नहीं किया और झूठ मानकर हमले जारी रखा.

युद्ध समाप्ति के 7 साल बाद 1952 में, जापानी सरकार ने एक आखिरी कोशिश की अपने छिपे हुए सैनिकों को बाहर लाने की. इस बार, गुमशुदा सिपाहियों के परिवार की तस्वीर और उन्हीं का सन्देश छापकर बंटवाई गई. साथ ही उसमें सम्राट की तरफ से एक निजी सन्देश भी था. एक बार फिर, हीरू ओनीडा ने उस सूचना को सच मानने से इनकार कर दिया. फिर से उसने मान लिया कि यह अमेरिकी सेना की कोई चाल है. एक बार, फिर से उसने और उसके आदमियों ने युद्ध का अपना मोर्चा संभाल लिया.

कुछ और साल गुजर गए और उनके आतंक से डरे फिलीपींस के स्थानीय लोगों ने उनका सामना करने के लिए हथियार उठा लिए. साल 1959 तक, हीरू ओनीडा के एक आदमी ने समर्पण कर दिया और दूसरा मारा गया. फिर, एक दशक बाद हीरू ओनीडा का आखिरी साथी कोजुका स्थानीय पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया. ये लोग विश्वयुद्ध खत्म होने के 25 साल बाद भी जंग जारी रखे हुए थे. क्योंकि उन्हें उनके सैन्य कमांडर से युद्ध रोकने का आदेश नहीं मिला था. वे उस आदेश के साथ आए थे कि सरेंडर नहीं करना है और दुश्मन को जितना संभव हो नुकसान पहुंचाते रहना है ताकि जापान को अमेरिकी हमले से सुरक्षित रखा जा सके. हीरू ओनीडा जो अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी लुबांग के जंगलों में बीता चुका था वह अब बिल्कुल अकेला रह गया था. लेकिन वह जंग से पीछे हटने को तैयार नहीं था.

साल 1972 में जब उसके आखिरी साथी कोजुका की मौत की खबर जापान पहुंची तो वहां हलचल सी मच गई. जापानी सेना ये मान चुकी थी कि अब उसका कोई सिपाही जंग के मैदान में नहीं है. जापान के लोगों को जंग हारने के 25 साल बाद भी जापान के लिए लड़ रहे अपने सैनिकों में हीरो दिखने लगा. लोगों में उम्मीद जगी कि हो न हो उनका लेफ्टिनेंट हीरू ओनीडा अभी भी मैदान में डटा होगा. उस साल, जापानी सरकार ने अपने साहसी लेफ्टिनेंट की तलाश में जंगल में खोजी दस्ता भेजा पर उन्हें कुछ नहीं मिला.

पूरा जापान हीरू ओनीडा को नायक मानने लगा था और उसकी वीरता के किस्से हर किसी की जुबान पर थे. हीरू ओनीडा एक जीवित किवदंती बन चुका था. लोग उसे परिकथा का नायक मानने लगे थे. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी फिलीपींल के जंगलों में उसका कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. जापान का ही एक युवक था नोरिओ सुजुकी जो रोमांच और खोज में रूची रखता था उसने फिलीपींस के जंगलों में लगातार खोजी अभियान चलाकर हीरू ओनीडा का पता लगा लिया. उससे बातचीत में हीरू ओनीडा ने साफ कहा कि उसे सरेंडर नहीं करने के आदेश मिले थे और वह उसका पालन कर रहा है. नोरिओ सुजुकी ने जापान के युद्ध की सच्चाई और जापान के लोगों की राय हीरू ओनीडा को सुनाई तब जाकर उसे यकीन हुआ. लेकिन वह सरेंडर करने को फिर भी तैयार नहीं था. फिर जापान से उसके जिस कमांडर ने उसे आदेश देकर युद्ध में भेजा था जो अब रिटायर्ड होकर बुकसेलर का काम कर रहा था. जापानी सेना ने उसे फिलीपींस के जंगल में भेजा. उसके आदेश के बाद हीरू ओनीडा ने फिलीपींस के सामने सरेंडर किया. फिलीपींस की सरकार ने वॉर रूल के तहत उसे माफी दे दी और जापान वापस जाने दिया.

हीरू ओनीडा साल 1974 में यानी दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होने के 29 साल बाद जापान वापस लौटा. 18 साल की उम्र में सैनिक बने हीरू ओनीडा जब 29 साल गुरिल्ला वॉर लड़कर जंगल से निकले तो उनकी उम्र थी 52 साल. पूरे जापान ने इस हीरो का स्वागत किया. वह अपने देश में एक तरह से सेलेब्रिटी बन गया. रेडियो के तमाम कार्यक्रमों में वह अपनी वीरता के किस्से सुनाने के लिए बुलाया जाने लगा. जंगल में बिताए दशकों के बारे में और गुरिल्ला युद्ध के बारे में उसने अपनी आत्मकथा No Surrender: My Thirty-Year War समेत कई किताबे लिखीं. उसने ब्राजील में भी वायु सेना की ट्रेनिंग के लिए काम किया. जापान में युवाओं पर उसने संस्था चलाई. साल 2014 में 91 साल की उम्र में टोक्यो में हीरू ओनीडा का निधन हो गया. लेकिन इस वीर सिपाही की कहानी सदा-सदा के लिए अमर हो गई.

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments